अकेली होती रेत – अश्विनी शर्मा

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OFFICERS TIMES Ashwini Sharma
एक बगूला बैठा देता है
आसमान पर रेत को
हवा के हिंडोले में
हिचकोले खाती रेत
छूती है अनजान ऊंचाईयां

आश्चर्य से देखती है
जड़ पड़े उन टीलों को
जिनका अंशभूत ही है वो स्वयं

ऊंचाईयों के सम्मोहन में उलझी रेत
बड़ी आर्द हो देखती है
अभी भी नीचे पड़े टीलों को

फिर अचानक
रो उठती है दहाड़े मारकर
कितनी अकेली हो जाती है रेत
टीलों से अलग होते ही

ऊंचाईयां, न समान हैं न राहत
बस अकेलापन है।

राजस्थान प्रशासनिक सेवा 1989 बैच के अधिकारी अश्विनी शर्मा काव्य जगत में खास पहचान रखते हैं। गजल पर अश्विनी की मजबूत पकड़ है। रेत पर उनकी कविताएं देशभर में मशहूर हैं। अश्विनी का कविता संग्रह रेत रेत धड़कन और गज़ल संग्रह वक्त से कुछ आगे बेहद मशहूर हैं। यह दोनों ही संग्रह कविता कोष में संकलित हैं। अश्विनी के ब्लॉग पर उनकी रचनात्मकता को जीवंत होते पल-पल देखा जा सकता है। ब्लॉग : www.ashvaghosh.blogspot.in

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