पाने को खुशी के पल – रामकिशोर उपाध्याय

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OFFICERS TIMES  Ramkishore Upadhyay IRAS
पाने को आदमी, खुशी के पल,
छलता जाता खुद को हर पल।

कभी पिघलता जिस्म की गर्मी से
कभी जमता रिश्तों की बेरुखी से
घुटकर रह जाता कभी अचल,
छलता जाता खुद को हर पल।

कभी आती धुंध को ही सच मानता
कभी जाती गंध को समेटना चाहता
गिरता कभी टूटते तारे सा विकल,
छलता जाता खुद को हर पल।

कभी झरने का पानी बन बहता
कभी जंगल की आग बन जलता
भ्रम में उलझ रह जाता अचल,
छलता जाता खुद को हर पल।

कभी आशा में विचलित हो जाता
कभी निराशा में प्रेम गीत भी गाता
देख शोख अदाएं जाता मचल,
छलता जाता खुद को हर पल

कभी सिक्कों के लिए दानव बनता
कभी सिक्का बन भट्टी में गलता
माया नगरी में लुटता पल पल,
छलता जाता खुद को हर पल।

एक अमूर्त या मूर्त है खुशी
एक टुकड़ा या पूर्ण है खुशी
उत्तर भंवर में अगर है सबल,
छलता जाता खुद को हर पल।

अर्थ, काम या मोक्ष है खुशी
भीतर छलकी पड़ी है खुशी
ठगेगी वरना खुशी, तू बस चल,
छलता जाता खुद को हर पल।

(रचनाकार रामकिशोर उपाध्याय भारतीय रेलवे लेखा सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं। फिलहाल नई दिल्ली में उत्तर-मध्य रेलवे में उप मुख्य लेखाधिकारी एवं वित्त सलाहकार पद पर सेवाएं दे रहे हैं। मूलत: मेरठ के रहने वाले उपाध्याय काव्य पर गहरी पकड़ रखते हैं। ड्राईंगरूम के कोने उपाध्याय का चर्चित काव्य संग्रह है। उपाध्याय का ब्लॉग – www.meraavyakta.blogspot.com भी बेहद चर्चित है।

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