माया – रामकिशोर उपाध्याय

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OFFICERS TIMES  Ramkishore Upadhyay IRAS(लघु कथा)। आज मोहन पूरे दिन उदास था। उसका दफ्तर की फाइलों में मन नही लग रहा था। बार बार कमरे के बाहर जाता और वापस आ जाता। एसी भी बंद कर रखा था। उसके एक स्टाफ ने पूछा कि वह आज परेशान क्यों है ,कमरा भी गरम है ? उसने जवाब भी आधा अधूरा ही दिया। फिर सन्नाटा।
उसका परेशान होने का कारण भी तो नहीं था। अचानक लैंडलाइन फोन की घन्टी बजी और उसने चौंक कर रिसीवर उठाया। एक आवाज थी महीन सी जैसे कोई बीमार हो और कहने लगी वह माया है। वही तीस बरस पहले की उसकी सहपाठी। उसने पूछा कि फोन क्यों किया। जवाब आया कि वह इस संसार से विदा हो रही थी, क्योंकि काफी गंभीर रूप से बीमार थी। बस एक बार मोहन से बात करने की इच्छा थी। यह वही माया थी जिसे वह प्रेम करता था और विवाह करके अपनी एक अलग दुनिया बसाना चाहता था। मोहन अपने अतीत में लौट गया इससे पहले वह कुछ और पूछता उधर से फोन कट गया। मोहन जोर से हंसा और अपनी फाइलों में जुट गया। बाद में पता चला कि माया को गुज़रे तो कई बरस हो गए ….शायद यह मोहन की इच्छा रही होगी कि माया उससे बात करे …मोहन के अवचेतन मन में कोई अनसुलझी ग्रंथि थी जो खुलकर हंसने से खुल गयी …उसका अतीत अब व्यतीत हो गया था और शाम को बड़ी तेजी से घर की ओर बढ़ चला ….।

(रचनाकार रामकिशोर उपाध्याय भारतीय रेलवे लेखा सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं। फिलहाल नई दिल्ली में उत्तर-मध्य रेलवे में उप मुख्य लेखाधिकारी एवं वित्त सलाहकार पद पर सेवाएं दे रहे हैं। मूलत: मेरठ के रहने वाले उपाध्याय काव्य पर गहरी पकड़ रखते हैं।ड्राईंगरूम के कोने उपाध्याय का चर्चित काव्य संग्रह है। उपाध्याय का ब्लॉग – www.meraavyakta.blogspot.com भी बेहद चर्चित है।