‘राजे’ से सब ना’राज’, अब कैसे चलेगा यह ‘राज’

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‘राजे’ जानती हैं, कि वो अब दुबारा सत्ता में नहीं लौटेंगी! अब तो पार्टी के ग्रासरूट कार्यकर्ताओं तक ने यह मानना शुरू कर दिया है। सत्ता के ताबूत में नोटबंदी की कील ठोकने से शुरू हुआ सिलसिला थम ही नहीं रहा है। एक के बाद एक असफलताओं के बाद न केवल केन्द्र सरकार की बाजार में किरकिरी हो रही है, बल्कि राज्य सरकार के चार साल पूरे होने आए खाली हाथ ही हैं।

चार साल गुजरने को हैं। खाली हाथ किसान, बेरोजगार, सरकारी कर्मचारी और अब बचे-खुचे डॉक्टर्स भी सरकार के खिलाफ हैं। चर्चे हैं कि मैडम मोटी फाइलों में व्यस्त हैं। …और छोटी फाइलों में उनकी रुचि नहीं। लेकिन सत्ता में छोटी फाइलें और छोटा आदमी दोनों महत्त्वपूर्ण हैं। क्योंकि अब सालभर ही लगभग बचा है जब वोट संग्रहण के लिए छोटे से छोटे कामों पर चर्चा होगी। छोटी से छोटी फाइलों को लेकर सुलगते तवों पर ठंडे पानी की छन्न सी सुलगती आवाजें होंगी। और छोटे से छोटे आदमी की पूछ बढ़ जाएगी। ज्यादा कुछ नहीं होगा, तो बेचारा छोटा आदमी चुनावों में ही सही खुद को बड़ा तो महसूस कर ही लेगा। क्योंकि नाउम्मीदी के बाजार में घटनाओं का केन्द्र और राज्य सरकार ने ऐसा समा बीते कुछ समय में बांध दिया है कि अब भारी पडऩे लगा है।

अपने ही शीर्ष मंत्रियों के पर कतरना, मीडिया का पैसा रोकना, आनंदपाल मामले में उपजी राजपूत समाज की भारी नाराजगी, मैडम के बेटे द्वारा प्रताडि़त मंत्रियों के दर्द सार्वजनिक होना, शेखावाटी और मरूप्रदेश में नाक में दम करने वाला किसान आंदोलन, भ्रष्ट लोकसेवकों को बचाने के लिए कानून की तैयारी, डॉक्टरों की हड़ताल जैसे दर्जनों स्थानीय मुद्दों ने तो नाक में दम कर ही दिया है, लेकिन इन सबके बीच जीएसटी लागू होने की घटना ने बाजार की कमर तोड़ दी है। नोटबंदी के बाद जीडीपी में गिरावट, रियल एस्टेट का क्रैश होना, जीएसटी लागू होने के साथ ही व्यापारियों का भड़कना जैसी घटनाएं सरकार को जमकर पानी पिला चुकी हैं।

अब रुख बदल सा रहा है। कई जिले पूरी तरह साफ हो चुके हैं। न भाजपा के कंट्रोल में बचे हैं। न मोदी की हवा बनाने से इन पर असर छूटने वाला है। इन उत्तरी राजस्थान ले लें, या फिर पूर्वी, पश्चिम के भी यही हालात हैं। थोड़ी बहुत इज्जत बची है, तो मैड़म के अपने इलाके में बचाए रखी गई है। राजधानी भी हाथ से निकल रही है। मेयर और मंत्री हिटलर बनकर शहर की सफाई कर रहे हैं। व्यापारियों की दीपावली बर्बाद कर दी है और व्यापारी व्यापार करने की बजाय धरनों से विरोध जताने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन किसे फर्क पड़ता है। बड़ी फाइलें हैं। बड़े प्रोजेक्ट्स हैं। दुबारा आने का मानस न खुद है न केन्द्र का लाने का। ऐसे में पार्टी के बीच हो रही बगावत के सुर भी तेज हो गए हैं। भाजपा के ही वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाड़ी चुनावी बिगुल बजा चुके हैं। अपनी ताकत दिखाने को उतारु हो गए हैं। सरकार में मंत्रियों, विधायकों का सीधा जवाब है हमारे ही काम नहीं होते, तुम्हारे कहां से होंगे? आई.ए.एस., आई.पी.एस., आर.ए.एस. सहित अधिकारियों के तो जैसे अधिकार ही छीन लिए गए हैं, इसलिए वह भी परेशान। ऐसे में सीएम हाउस ही शायद अब सुरक्षित बचा है। इस खेमेबंदी, आंतरिक विरोध और रोष और एक के बाद एक घटनाओं का अन्य पार्टियों को स्वत: मिलने वाला लाभ राजे के इस राज में गहरे कोहरे सा घेरने में जुट गया है।

– प्रवीण जाखड़